Tuesday, December 17, 2013

प्यार के धागें ,,,,,,,,,,,
प्यार के धागें से बुने बन्धन पर
रिश्तों कि डोरी कुछ यूँ लगती है
जैसे दुल्हन के हाथों में
मेहंदी की बेल सजती हैं ,,,,,

छलकते है चाहत के रंग
रहता है कोई अंग - संग
उड़ती रहती है ख्वाईशें
हक़ीक़त के गलिआरों में
इतनी ख़ामोशी में भी
कानों में शहनाई बजती हैं ,,,,,

चुप रहती है ज़ुबान बोलती है आंखे
राज़ सारे दिल के खोलती है आंखे
मिलते है ज़बाब तब
अपने ही सवालो से
ज़िन्दगी कि पहेली भी
फ़िर ख़ुद -व - ख़ुद सुलझती है
प्यार के धागें से बुने,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, राजेश कोंडल 

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