Thursday, August 8, 2013

"मौसमी ईश्क"    
राजेश कौंडल 

मौसमी ईश्क आया मेरी ज़िन्दगी में,
मौसम के साथ मगर वो गुज़रा नहीं
ठहरा रहा किसी शाख़ पर सूखे पते की तरहा
नई ऋतु आने को है
लेकिन वो अब तलक झड़ा नहीं ,,,,,,,,,,,
है यकीं उसको की वो फिर से हरा होगा ,
छूट गया था जो लम्हा उसके हाथों से
वो उस के लिए फिर से खड़ा होगा ,
मगर वो शायद ये नहीं जानता कि
गुज़रा वक्त लौट कर नहीं आता
आती है तो बस उसकी यादें
यादों का ही नशा है इसको शायद
जो अब तलक उतरा नहीं ,,,,,,,,,,
                                                    राजेश कौंडल 


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