कड़कती धूप मे सड़क किनारे
पत्थर तोड़ता है जो ,,,,,,,,,,,,,
हो ना हो ख़ुदा है वो ,,,,,,,,,,,,,,
गली गली घूम कर सब को
दुआ देता फिरता है जो ,,,,,,,,
हो ना हो ख़ुदा है वो ,,,,,,,,,,,,,,
खुद भूखा रह कर रात भर जागके
हमें सुलाता है जो ,,,,,,,,,,,,,,,
हो ना हो ख़ुदा है वो ,,,,,,,,,,,,,,
अपनों को छोड़ कर हमारे लिऎ
सरहद पर खड़ा है जो ,,,,,,,,,,,
हो ना हो ख़ुदा है वो ,,,,,,,,,,,,,,
*राजेश कोंडल*
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