Friday, April 5, 2013

कुछ रस्मे जमाने की,,,,,,,,,,,,,,,

Written by :Rajesh Kondal

कुछ रस्मे जमाने की निभानी पड़ती है
वकत की रह पर ठोकर भी खानी पड़ती है
कुछ लम्हे गुज़र जाते ही उनकी यादे नहीं जाती
वकत के साथ ये यादे भी भुलानी पड़ती है
क्या करोगे तुम पुराने इन खतो का
एक दिन सारी चिठिया खुद जलानी पड़ती है
कुछ दुःख वकत के साथ कम हो जाते है
कुछ उलझाने खुद सुलझानी पड़ती है
हाथो की लकीरों से कुछ नहीं मिलता
किस्मत खुद नहीं बनती बनानी पड़ती है

                                                                             " राजेश कोंडल"

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