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| written by : Rajesh kondal |
वकत सम्भलो तो ये अब भी सब्हल सकता है
न सम्भालो गे अगर तो हाथ से निकल सकता है
तुम जो चाहो तो शोलो को बना दो शबनम
तुम अगर चाहो तो पत्थर दिल पिघल सकता है
सोचते रहोगे तो कुछ नहीं होगा
करोगे कोशीश तो कल बदल सकता है
आज का दिन ही बस तेरा है सोच ले
सूरज का क्या ही कभी भी ढल सकता है
राजेश कोंडल
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