Wednesday, November 3, 2010

दिल में है रब बस्ता


जब हर दिल में है रब बस्ता

होने को फिर क्या नहीं हो सकता

दिल मे अगर चाह हो मंजिल की

फिर खुद ब खुद बनता जाये रास्ता

पा सका न कोई खुदा को दोलत से

पर प्यार के मौल में मिले सस्ता

रोते हुओके जो आंसू पोंछेगा

बो ही जग छोड़ेगा हँसता हँसता

तू है करता तू ही उसे भरता ए बन्दे

फिर क्यों फिरे तू दर दर भटका भटका…


राजेश कोंडल

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