Monday, July 12, 2010

मेरी नज़र से


सूखे कुई की तरह
सुख चुकी है अब शायरी
बस जुवान ही गीली है
येभी सुख न जाये कही
ये सोच कर मैंने
जुवान भी सिली है



कलम तो है मगर
स्याही नहीं है उसमे
सोच तो है मगर
गहराई नहीं है उसमे
कतरा कतरा मैंने जो जोड़ कर
राखी थी जिंदगी
लगता है अक ही पल मे
मैंने साडी बो जिली है


लफ्ज तो गिरते है मगर
गिरते ही बिखर जाते है
ख्याल आते तो है मन मे
न जाने फिर किदर जाते है
वक्त मिले तो उस पर
कुछ लिखू फिर मे
फुरसत तो साडी
एक घूंट मे पिली है………

राजेश कोंडल......

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