मेरी नज़र से
सूखे कुई की तरह
सुख चुकी है अब शायरी
बस जुवान ही गीली है
येभी सुख न जाये कही
ये सोच कर मैंने
जुवान भी सिली है
कलम तो है मगर
स्याही नहीं है उसमे
सोच तो है मगर
गहराई नहीं है उसमे
कतरा कतरा मैंने जो जोड़ कर
राखी थी जिंदगी
लगता है अक ही पल मे
मैंने साडी बो जिली है
लफ्ज तो गिरते है मगर
गिरते ही बिखर जाते है
ख्याल आते तो है मन मे
न जाने फिर किदर जाते है
वक्त मिले तो उस पर
कुछ लिखू फिर मे
फुरसत तो साडी
एक घूंट मे पिली है………
राजेश कोंडल......
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