नदिया सूखी नाले सूखे,
कही न बूंद पानी
है दरिया भूखे
हर कोई है तेरी आस लगाये
हर कोई है ये खाब सजाये
की तू आकार उनकी प्यास बुझाये
काली बदली ओ काली बदली
अब तो बरस जा काली बदली...........
न कोई भवरा गुण गुनता है
न कोई कोयल गीत सुनती है
सारी शाखाए सुनी पड़ी है
न कोई चिड़िया घोसला बनती है
धरती बट रही है खंडो मे
आग लगी है सूखे झुंडो मे
तहस मह्स हुआ जीवन सारा
सोचता है बुडा बरगद बेचारा
की तू उसके हालत पर कोई अंशु बहाए ………
बागो मे न रही है तितलिया
दरिया मे न रही है मछलिया
हर कही उड़ रही है चिनगारिया
पानी को तरस रही है प्यासी नदिया
नागे सर बठी है उदासी नदिया
इसका पर्बत ये सब देख रहा है
मन ही मन कुछ सोच रहा है
मैंने जो ओडी थी जो चादर वो
चादर तू फिर दे जाये………॥
No comments:
Post a Comment