
जिसने सही है दोपहर की कराकती धुप
ये शाम की ठंडी हवाए है उनकेलिए…
जो बैठे थे शीशे के घरो में तसबुर से
सोचता हु वो यहाँ आये है किस के लिए…..
रखता है ख्याल वो, जो मालिक है सबका
कही धुप कही छाव ये करिश्मा है उसी का
रोते हुआ चेहरों को हसी की फुआर देता है
पर जिन्होंने रुलाया है वो हस्ते है किस के लिए…
तपती रेत पर जो नागे पव चलते रहे
कोई पश्चाताप नही फिर भी जलते रहे
रत की चांदनी जब आती है इनको सुलाने
तब घरो से निकल कर सब टहलते है किस के लिए…
ये शाम की ठंडी हवाए है उनकेलिए…
जो बैठे थे शीशे के घरो में तसबुर से
सोचता हु वो यहाँ आये है किस के लिए…..
रखता है ख्याल वो, जो मालिक है सबका
कही धुप कही छाव ये करिश्मा है उसी का
रोते हुआ चेहरों को हसी की फुआर देता है
पर जिन्होंने रुलाया है वो हस्ते है किस के लिए…
तपती रेत पर जो नागे पव चलते रहे
कोई पश्चाताप नही फिर भी जलते रहे
रत की चांदनी जब आती है इनको सुलाने
तब घरो से निकल कर सब टहलते है किस के लिए…
"राजेश कोंडल '
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