![]() |
| written by : Rajesh kondal |
एक ही खाब को आँखों मे कई बार सजाया मैंने.
अपने ही अश्को से फिर उस खाब को मिटाया मैंने.
राह के जिस मोड़ पर बदल गई थी मंजिल मेरी
आज फिर उसी रह पर कदम को उठाया मैंने
जो था मसीहा मेरा, आज उसे पत्थर कह दिया
न चाहते हुआ भी जुल्म कमाया मैंने
एक तरफ मोत है और एक तरफ बसर तनहा
प्यार मे क्या कहू की क्या पाया मैंने
धुआ ही धुआ उठता रहा मगर आग न जल
आज इस कदर उसके खातो को जलाया मैंने
"राजेश कोंडल "

No comments:
Post a Comment